रिपोर्ट के अनुसार, टैक्स के अलावा होने वाली आय भी करीब 10% बढ़ने की उम्मीद है. इसकी वजह सरकारी कंपनियों से होने वाला लाभ और लाभांश सामान्य स्तर पर रहना है. इस अनुमान में आरबीआई से किसी खास अतिरिक्त राशि को शामिल नहीं किया गया है. सरकार के उधार में मामूली बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है, जो सालाना आधार पर करीब 3% रहने का अनुमान है. इसके चलते FY27 में राजकोषीय घाटा 4.1 से 4.2% के दायरे में रहने की संभावना जताई जा रही है. यह अनुमान सरकार की घाटा नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन की नीति के अनुरूप माना जा रहा है.
बीते 10 वर्षों में बजट प्राथमिकताओं में बदलाव
रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 10 वर्षों में केंद्रीय बजट की प्राथमिकताओं में बड़ा बदलाव आया है. FY16 में कुल बजट का लगभग 20% हिस्सा पूंजीगत व्यय पर खर्च होता था, जो FY26 में बढ़कर 30.6% से अधिक हो गया है. पूंजीगत व्यय में यह निरंतर वृद्धि इस बात का संकेत है कि सरकार अब दीर्घकालिक परिसंपत्तियों के निर्माण और भविष्य की आर्थिक वृद्धि पर अधिक जोर दे रही है. पिछले दस वर्षों में पूंजीगत व्यय औसतन 15% की सालाना दर से बढ़ा है, जबकि रोजमर्रा के खर्च यानी राजस्व खर्च की वृद्धि दर करीब 8.8% रही है.
इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस, निजी निवेश को बढ़ावा
इसका मतलब है कि सरकार सिर्फ खर्च बढ़ाने की बजाय इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, कामकाज की क्षमता बढ़ाने और निजी निवेश को आकर्षित करने पर ज्यादा ध्यान दे रही है. अनुमानित पूंजीगत व्यय में राज्यों को दी जाने वाली सहायता और पूंजीगत संपत्तियों के लिए अनुदान भी शामिल हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, FY27 में कुल सार्वजनिक पूंजीगत व्यय करीब 17 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर आधारित विकास को और मजबूती मिलने की संभावना है. बजट में रक्षा और प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर खर्च सरकार की प्राथमिकताओं में शीर्ष पर बना रह सकता है.
भविष्य के सेक्टर और बढ़ता ब्याज बोझ
हालांकि, आने वाले समय में तकनीक, ऊर्जा और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों पर भी सरकार का फोकस धीरे-धीरे बढ़ सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ब्याज भुगतान का बढ़ता बोझ सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, जिसके चलते बजट खर्च में ज्यादा लचीलापन बनाए रखना आसान नहीं होगा.
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