Yoga Tips: सर्वांगासन और हलासन के बाद क्यों करना चाहिए मत्स्यासन? जानिए काउंटर-पोज का महत्व

Shivam
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Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
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Yoga Tips: योग में हर आसन का अपना अलग महत्व होता है, लेकिन इसका पूरा लाभ तभी मिलता है जब आसनों का अभ्यास सही क्रम, तकनीक और संतुलन के साथ किया जाए. सर्वांगासन और हलासन को योग के महत्वपूर्ण आसनों में गिना जाता है. हालांकि, इन आसनों के बाद शरीर के कुछ हिस्सों, खासकर गर्दन, कंधों और रीढ़ पर दबाव पड़ सकता है. ऐसे में मत्स्यासन को काउंटर-पोज यानी विपरीत आसन के तौर पर किया जाता है. सवाल यह है कि सर्वांगासन और हलासन के बाद मत्स्यासन करना क्यों जरूरी माना जाता है और यह शरीर को किस तरह संतुलित करने में मदद करता है? आइए जानते हैं.

सर्वांगासन और हलासन के बाद मत्स्यासन क्यों?

सर्वांगासन और हलासन के दौरान शरीर उल्टी स्थिति में रहता है. इन आसनों में ठुड्डी छाती की ओर आने के कारण गर्दन और ऊपरी रीढ़ पर विशेष स्थिति में दबाव पड़ता है. इसके बाद मत्स्यासन करने से शरीर को विपरीत दिशा में स्ट्रेच मिलता है. योग विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह का काउंटर-पोज शरीर को दोबारा सामान्य स्थिति में लाने और गर्दन, कंधों तथा रीढ़ के आसपास महसूस होने वाले तनाव को कम करने में मदद कर सकता है.

क्या कहती हैं योग की गाइडलाइंस?

आयुष मंत्रालय और मोरारजी देसाई राष्ट्रीय योग संस्थान की योग संबंधी गाइडलाइंस में भी आसनों के क्रम और काउंटर-पोज के महत्व पर जोर दिया जाता है. सर्वांगासन और हलासन जैसे आसनों के बाद मत्स्यासन को पूरक आसन के रूप में अभ्यास कराया जाता है. इसका उद्देश्य शरीर पर पड़े खिंचाव और दबाव को संतुलित करना तथा अभ्यास को अधिक व्यवस्थित तरीके से पूरा करना है.

गर्दन और रीढ़ को मिलता है विपरीत स्ट्रेच

सर्वांगासन और हलासन के दौरान गर्दन और रीढ़ एक विशेष स्थिति में रहती है. वहीं, मत्स्यासन में सिर के ऊपरी हिस्से को जमीन पर टिकाते हुए गर्दन और रीढ़ को पीछे की ओर मोड़ा जाता है. इस वजह से मत्स्यासन को इन आसनों के बाद किया जाने वाला काउंटर-स्ट्रेच माना जाता है. इससे गर्दन, कंधों और ऊपरी पीठ के आसपास के खिंचाव को संतुलित करने में मदद मिल सकती है.

काउंटर-पोज का क्या है सिद्धांत?

योग अभ्यास में किसी आसन के बाद उसके प्रभाव को संतुलित करने के लिए विपरीत दिशा में हल्का स्ट्रेच देने वाले आसन का इस्तेमाल किया जाता है. इसे काउंटर-पोज कहा जाता है. सर्वांगासन और हलासन में गर्दन और शरीर की स्थिति आगे की ओर रहती है, जबकि मत्स्यासन में रीढ़ और गर्दन को पीछे की ओर स्ट्रेच किया जाता है. यही वजह है कि दोनों को एक-दूसरे के पूरक आसनों के तौर पर अभ्यास कराया जाता है.

किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?

इन आसनों का अभ्यास हर व्यक्ति के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं हो सकता. खासकर गर्दन या रीढ़ से जुड़ी समस्या, गंभीर बीमारी, हालिया सर्जरी या गर्भावस्था की स्थिति में बिना विशेषज्ञ की सलाह के सर्वांगासन, हलासन या मत्स्यासन नहीं करना चाहिए. योग का अभ्यास हमेशा सही तकनीक और प्रशिक्षित विशेषज्ञ की देखरेख में करना बेहतर होता है. अगर किसी आसन के दौरान गर्दन, पीठ या शरीर के किसी हिस्से में दर्द या असहजता महसूस हो, तो अभ्यास रोककर विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए.

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