लखीमपुर खीरी को मिलेगी नई पहचान, खत्म हुई 308 पहिए वाले ट्रक की जर्नी, बलरामपुर पहुंचा बेल्जियम वाला वेसल

Aarti Kushwaha
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)

Belgium Vessel News : बेल्जियम से आई मशीन को आखिरकार जहां पहुंचना था वहां पहुंच तो गई, लेकिन इस मशीन की यात्रा कोई नहीं भुला सकेगा. 308 पहिए वाले ट्रक से लाए जाने वाले वेसल के रास्ते में कभी पेड़ टूटे, कभी सड़कें तो कभी तो मोबाइल टावर और ब्रिज तक टूट गए. इस सफर में बेचारे ट्रक की हालत इस कदर खस्ता हो गई 58 पहिए ही ट्रक से हटाने पड़ गए. 250 पहियों के सहारे यह भारी-भरकम उपकरण आगे बढ़ा.

बेल्जियम से समुद्र के रास्ते भारी भरकम वेसल को ओडिशा लाया गया. फिर एक एक शहर पार करते हुए बलरामपुर पहुंचा गया. बेल्जियम से लाया गया करीब 41 मीटर लंबा और 180 से 200 टन वजनी यह रिएक्टर शनिवार सुबह बलरामपुर चीनी मिल की केमिकल डिवीजन इकाई पहुंचा. इसे एक खास ट्रेलर पर लादकर लाया गया. यह रिएक्टर लखीमपुर खीरी की कुंभी चीनी मिल में बनने वाले बायोपॉलिमर प्लांट के लिए लाया गया है. इस प्लांट में गन्ने से मिलने वाली चीनी और स्टार्च की मदद से जैव आधारित प्लास्टिक यानी पीएलए बनाया जाएगा.

क्या है इस प्लांट की खासियत?

बता दें कि बलरामपुर चीनी मिल समूह का यह प्रोजेक्ट करीब 3,080 करोड़ रुपये की लागत से तैयार किया जा रहा है. इसमें हर साल 80 हजार टन बायोपॉलिमर बनाने का लक्ष्य रखा गया है. कंपनी के मुताबिक, यह भारत का पहला और दुनिया का चौथा ऐसा प्लांट होगा. बलरामपुर चीनी मिल के प्रबंधक आशीष प्रताप सिंह के अनुसार, पीएलए का इस्तेमाल बोतल, कप, प्लेट, खाने के डिब्बे और पैकेजिंग से जुड़ी कई चीजें बनाने में किया जाता है. इसे पेट्रोलियम से बनने वाले पारंपरिक प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है.
पीएलए पौधों से मिलने वाली चीनी और स्टार्च से तैयार किया जाता है. यही वजह है कि इसे जैव आधारित प्लास्टिक कहा जाता है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि इससे बनी हर चीज खुले वातावरण या सामान्य मिट्टी में आसानी से गल जाएगी. इसके विघटन में कितना समय लगेगा, यह उत्पाद की बनावट और तापमान व नमी जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करता है.

रास्ते में हटाने पड़े बिजली के पोल, पेड़ और तोड़ना पड़ा पुल

इस मशीन का राह आसान नहीं थी. इसे बेल्जियम से समुद्री रास्ते के जरिए पहले ओडिशा, इसके बाद झारखंड और बिहार होते हुए उत्तर प्रदेश पहुंचाया गया. भारी वजन और आकार के कारण ट्रेलर की रफ्तार काफी धीमी रखनी पड़ी. इसे रोजाना करीब 10 से 20 किलोमीटर ही चलाया गया और सुरक्षा के लिए रात में रोक दिया जाता था. रास्ते में कई जगह ट्रेलर को निकालने के लिए खास इंतजाम करने पड़े. कहीं बिजली के पोल और तार हटाए गए, तो कहीं रास्ता बंद करना पड़ा. कैमूर में ट्रेलर को आगे निकालने के लिए एक पुल तक तोड़ना पड़ा.
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