प्रभु-विरह का आनंद ही भक्ति की पराकाष्ठा – दिव्य मोरारी बापू

Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Must Read
Shivam
Shivam
Reporter The Printlines (Part of Bharat Express News Network)
Puskar/Rajasthan: परम पूज्य संत श्री दिव्य मोरारी बापू ने कहा, भगवान के विरह में बावरे बनें हुए बृजवासी भक्तों को प्रभु ने आश्वासन दिया कि जितना आनन्द मिलन में है, उतना ही बल्कि उससे भी ज्यादा आनन्द बिरह में है। संसार के लिए आंसू बहाना व्यर्थ ही जाता है लेकिन अगर ईश्वर के लिए आँसू बहा तो जीवन धन्य बनता है।
रासलीला में संसार का सुख या मोह की बात नहीं है। रासलीला तो जीव और शिव की विशुद्ध भक्ति लीला है। रासलीला का अर्थ होता है जीव और ब्रह्म का मिलन। भक्ति और मोह – यह दोनों अलग-अलग विषय है। शरीर में कोई रोग हो जाय तो मोह जाता रहता है, जबकि भक्ति तो क्षण क्षण वर्धमान होती है, बढ़ती है। नारद भक्ति सूत्र में देवर्षि नारद जी भक्ति की परिभाषा करते हुए कहते हैं कि- भक्ति वह है जो निरन्तर बढ़ती ही रहती है।’क्षण क्षण वर्धमानम् ‘ ।
मोह में अत्यन्त उतावलापन होता है। भक्ति में अत्यन्त धैर्य होता है. उतावलापन उल्कापात – झंझावात पैदा करता है। धैर्य नव सृजन – नवनिर्माण की प्रतिष्ठा करता है। आपके आँगन में आया हुआ भिखारी भी प्रभु का स्वरूप है। उसे जूठा भोजन नहीं देना चाहिए। सभी हरि भक्तों को पुष्कर आश्रम एवं गोवर्धनधाम आश्रम से साधु संतों की शुभ मंगल कामना।
Latest News

गर्मी में इलायची का दूध पीने के होते है जबरदस्त फायदे, जानिए शरीर पर क्या होता है असर

Cardamom milk benefit: गर्मियों के मौसम में चिलचिलाती धूप और गर्म हवाएं अक्सर हमारे शरीर की ऊर्जा सोख लेती...

More Articles Like This