Business News: अमेरिका की ओर से रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर कड़े टैरिफ लगाने की तैयारी ने भारत के इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट सेक्टर की चिंता बढ़ा दी है. अमेरिकी सीनेट ने लिंड्से ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 86-11 वोट से मंजूरी दे दी है. बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस की ऊर्जा के बड़े आयातकों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है. हालांकि, यह अभी कानून नहीं बना है और आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना बाकी है.
इस प्रस्तावित कानून को लेकर भारतीय इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट सेक्टर ने चिंता जताई है. EEPC India का कहना है कि अगर यह प्रावधान कानून बनकर लागू होता है और भारतीय सामान पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो अमेरिका में भारतीय इंजीनियरिंग उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है. अमेरिका भारतीय इंजीनियरिंग सामान का प्रमुख बाजार है.
क्यों बढ़ी भारतीय एक्सपोर्टर्स की चिंता?
EEPC India के चेयरमैन पंकज चड्ढा के मुताबिक, अमेरिका भारतीय इंजीनियरिंग सामान के लिए सबसे महत्वपूर्ण बाजार है. ऐसे में किसी भी अतिरिक्त लेवी से भारतीय उत्पादों की कीमत अमेरिकी बाजार में बढ़ सकती है और उनकी प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर पड़ सकती है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अभी बिल कानून नहीं बना है, इसलिए इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन करना जल्दबाजी होगी. बिल की आगे की विधायी प्रक्रिया पूरी होने और उसके प्रावधानों के लागू होने की स्थिति साफ होने के बाद ही इसके असर का सही अंदाजा लगाया जा सकेगा.
अमेरिका को 19.60 अरब डॉलर का इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट
भारत के लिए अमेरिका का महत्व इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने अमेरिका को 19.60 अरब डॉलर के इंजीनियरिंग सामान का निर्यात किया. इसमें सालाना आधार पर 2.3 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई. भारत के इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट के लिए अमेरिका एक अहम बाजार बना हुआ है. ऐसे में किसी भी अतिरिक्त टैरिफ का असर भारतीय कंपनियों की कीमत, मांग और अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धा पर पड़ सकता है.
क्या है अमेरिकी बिल में प्रावधान?
सीनेट से पारित बिल के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों पर टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है जो रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदारों में शामिल हैं. इसमें रूस के कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के शीर्ष पांच आयातकों को ध्यान में रखने का प्रावधान है. इन देशों की पहचान कानून में स्थायी रूप से नाम लिखकर नहीं, बल्कि व्यापार आंकड़ों के आधार पर की जानी है. संबंधित आंकड़ों की समीक्षा हर 180 दिन में किए जाने का प्रावधान बताया गया है. भारत और अन्य बड़े रूसी ऊर्जा खरीदार इस प्रावधान के संभावित दायरे में आ सकते हैं. हालांकि, प्रस्तावित टैरिफ अपने आप लागू नहीं होंगे, बल्कि कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को इन्हें लगाने का अधिकार देगा.
पहले 500 फीसदी तक टैरिफ का था प्रस्ताव
इस बिल के पुराने संस्करण में रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 500 फीसदी तक के टैरिफ का प्रस्ताव था. बाद में संशोधित संस्करण में अधिकतम टैरिफ को घटाकर 100 फीसदी किया गया. इसके बावजूद 100 फीसदी तक का संभावित शुल्क भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ा जोखिम माना जा रहा है. खासकर ऐसे समय में जब भारत और अमेरिका के बीच व्यापार से जुड़े मुद्दों पर बातचीत भी महत्वपूर्ण बनी हुई है.
अब आगे क्या होगा?
सीनेट से मंजूरी मिलने के बाद बिल अब अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाएगा. वहां इसके टैरिफ प्रावधान को लेकर आपत्तियां भी सामने आई हैं. ऐसे में अभी यह तय नहीं है कि बिल मौजूदा स्वरूप में कानून बन पाएगा या आगे इसमें बदलाव किया जाएगा. भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर कानून लागू होता है और भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो इसका असर अमेरिकी बाजार में भारतीय इंजीनियरिंग सामान की कीमत और प्रतिस्पर्धा पर कितना पड़ेगा. फिलहाल भारतीय उद्योग जगत इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है.
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